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ऋषि मार्कण्डेय की कहानी | भगवान शिव ने अपने भक्त को अमर क्यों किया।

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ऋषि मार्कण्डेय की अटूट भक्ति बहुत समय पहले भारत की पवित्र भूमि पर महर्षि मार्कण्डेय नाम के एक महान ऋषि हुए। बचपन से ही वे भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके माता-पिता ने कठिन तपस्या के बाद उन्हें पुत्र रूप में पाया था। भगवान ने वरदान दिया था कि पुत्र अत्यंत तेजस्वी होगा, लेकिन उसकी आयु केवल 16 वर्ष होगी। जब मार्कण्डेय बड़े हुए, तो उन्हें अपनी अल्प आयु का रहस्य पता चला। यह सुनकर भी वे भयभीत नहीं हुए। उन्होंने निश्चय किया कि जीवन का हर क्षण भगवान शिव की भक्ति में बिताएँगे। वे प्रतिदिन प्रातःकाल नदी में स्नान करते, शिवलिंग पर जल चढ़ाते और पूरे मन से "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करते। समय बीतता गया और उनका सोलहवाँ वर्ष पूरा होने का दिन आ पहुँचा। उसी दिन यमराज अपने दूतों के साथ उनका प्राण लेने पहुँचे। लेकिन मार्कण्डेय भगवान शिव के शिवलिंग से लिपटकर ध्यान में लीन थे। यमराज ने उन्हें समझाया, "हे बालक! तुम्हारी आयु पूरी हो चुकी है। अब मेरे साथ चलो।" मार्कण्डेय ने शांत स्वर में कहा, "जब तक मेरे प्रभु शिव की कृपा मेरे साथ है, मुझे किसी का भय नहीं।" यमराज ने अपना पाश फेंका...