धरती का जादू : क्यों हम 5 किलोमीटर से आगे नहीं देख सकते?

 धरती का जादू: क्यों हम 5 किलोमीटर से आगे नहीं देख सकते? 


क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम खुले मैदान में खड़े होते हैं तो नज़रें किसी बिंदु के बाद रुक-सी जाती हैं? मानो धरती खुद हमें आगे देखने से रोक देती हो। असल में यह हमारी नज़र की सीमा नहीं बल्कि धरती की गोलाई का जादू है। 


धरती पूरी तरह गोल क्यों मानी जाती है?

धरती एक पूर्ण गोला नहीं बल्कि हल्की-सी चपटी गेंद जैसी है,जिसे वैज्ञानिक Oblate Spheroid कहते हैं। इसका मतलब है कि इसकी सतह सीधी नहीं बल्कि धीरे-धीरे झुकी हुई (curved) है। जब आप ज़मीन पर खड़े होते हैं तो आपकी आँखें इस घुमावदार सतह से ऊपर होती हैं। आपकी दृष्टि रेखा सीधी जाती है,पर सतह झुकने लगती है ।इसलिए कुछ दूरी के बाद धरती खुद ही आपकी नज़र को छुपा लेती है। 


क्षितिज;जहाँ धरती और आसमान मिलते हैं

वो बिंदु जहाँ आपकी नज़र रुक जाती है उसे कहा जाता है क्षितिज (Horizon) यानी वो सीमा जहाँ धरती की सतह इतनी झुक जाती है कि आगे कुछ दिखाई नहीं देता। अब सवाल आता है आख़िर ये सीमा कितनी दूर है? 


विज्ञान का फॉर्मूला

क्षितिज की दूरी को इस सरल समीकरण से निकाला जा सकता है:-

d = √2Rh

जहाँ

* (d) = क्षितिज तक की दूरी (किलोमीटर में)

* (R) = पृथ्वी का रेडियस ≈ 6371 किमी

* (h) = आपकी आँख की ऊँचाई (मीटर में) 


अगर आपकी ऊँचाई लगभग 1.7 मीटर है तो आप लगभग 4.7 किलोमीटर तक साफ़ देख सकते हैं यानि धरती की गोलाई हर 5 किलोमीटर पर आपकी दृष्टि को सीमा दे देती है। 


ऊँचाई बढ़े तो नज़ारा बढ़े

धरती की गोलाई से ऊपर उठने पर आपकी दृष्टि-सीमा भी बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए:

* टॉवर की ऊँचाई (100 मीटर) → आप 36 किमी तक देख सकते हैं

* हवाई जहाज (10000 मीटर) → आप 350 किमी दूर का क्षितिज देख सकते हैं

इसीलिए पहाड़ों से सूरज थोड़ा पहले उगता और देर से डूबता दिखाई देता है। 


गोल धरती का सुंदर भ्रम

धरती की यही गोलाई हमें रोज़ के कई “जादुई दृश्य” दिखाती है:-

* सूरज का धीरे-धीरे उगना और डूबना

* जहाज़ का धीरे-धीरे क्षितिज के पार गायब होना

* और वो पल जब आसमान और ज़मीन एक साथ मिलते नज़र आते हैं।

असल में ये सब हमारी नज़र का धोखा नहीं बल्कि धरती की कोमल गोलाई का कमाल है। 


निष्कर्ष:

धरती हमें सीमित नज़रिया देती है लेकिन यही सीमा हमें उसकी विशालता का एहसास कराती है। हम सिर्फ 5 किलोमीटर देख पाते हैं,पर उस सीमा के पार फैला है एक अनंत संसार,जो अभी भी हमें खोजने को बुला रहा है। 

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